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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य अपने आप को ऊँचा करे।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य] (ते) तेरे लिये (देवाः) प्रकाशमान (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानियों ने (उत) और (वीरुधः) ओषधों ने (चीतिम्=चितिम्) ज्ञान (अविदन्) प्राप्त किया है। (विश्वे) सब (देवाः) दिव्य पदार्थों [सूर्य, चन्द्र, वायु आदि] ने (ते) तेरे लिये (चीतिम्) चेतन्यता को (भूम्याम् अधि) पृथिवी के ऊपर (अविदन्) प्राप्त किया है ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विद्वान् वेदवेत्ताओं के उपदेश से और अन्न आदि ओषधों और सूर्य, चन्द्र, वायु, जल, आकाश आदि दिव्य पदार्थों में ईश्वरीय अटल नियमों से शिक्षा और उपकार प्राप्त करके, ईश्वर की महिमा के ध्यान में निमग्न होकर और परोपकार करके आनन्द पाते हैं ॥४॥
टिप्पणी: ४–देवाः। प्रकाशमानाः। दातारः। दिव्यपदार्थाः। सूर्यादयः। ते। तुभ्यं हे मनुष्य ! चीतिम्। इगुपधात् कित्। उ० ४।१२०। इति चिती ज्ञाने, जागरणे च–इन्, स च कित्, दीर्घश्छान्दसः। ज्ञानम्। जागरणम्। अविदन्। विद्लृ लाभे–लुङ्। लब्धवन्तः। ब्रह्माणः। अ० २।६।२। ब्रह्मज्ञानिनः। ब्राह्मणाः। वीरुधः। ओषधयः। भूम्याम्। अ० १।११।२। भू–मि। भूलोके। पृथिव्याम् ॥
