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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पौरुष का उपदेश किया जाता है।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे ईश्वर !] (लाङ्गलेभ्यः) हलों [की दृढ़ता] के लिये (नमः ते=नमस्ते) तुझे नमस्कार है और (ईषायुगेभ्यः) हरस [हल की लंबी लकड़ी] और जूओं [की दृढ़ता] के लिये (नमः) नमस्कार है। (क्षेत्रियनाशनी) शरीर वा वंश के दोष वा रोग की नाश करनेवाली (वीरुत्) ओषधि (क्षेत्रियम्) शरीर वा वंश के दोष वा रोग को (अप+उच्छतु) निकाल देवे ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे किसान लोग हल आदि उपयोगी और दृढ़ सामग्री के प्रयोग से अन्न उत्पन्न करते हैं, वैसे ही सब मनुष्य परमेश्वर के नियमों को साक्षात् करके उद्योग के साथ प्रयत्न से शरीर और अन्तःकरण की दृढ़ता करके उपकारी बनें और सदा आनन्द भोगें ॥४॥
टिप्पणी: ४–नमस्ते। नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च। पा० ३।२।१६। इति चतुर्थी। तुभ्यं नमस्कारः। लाङ्गलेभ्यः। लङ्गेर्वृद्धिश्च। उ० १।१०८। इति लगि गतौ–कलच्, वृद्धिश्च। लङ्गन्ति प्राप्नुवन्ति, अन्नादिकं येन तल्लाङ्गलम्। हलानां हिताय दृढत्वाय। ईषायुगेभ्यः। ईष गतिहिंसादर्शनेषु–क। टाप्। ईषा लाङ्गलदण्डः। उञ्छादीनां च। पा० ६।१।१६०। इति युज योगे–घञ्, अगुणत्वं निपात्यते। युज्येते बलीवर्दौ अस्मिन्निति युगो युगं वा रथहलाद्यङ्गम्। ईषाश्च युगानि च तेभ्यः। हलस्य दण्डयुगानां दृढत्वाय। अन्यद् गतम् ॥
