पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पौरुष का उपदेश किया जाता है।
पदार्थान्वयभाषाः - (भगवती=०–त्यौ) दो ऐश्वर्यवाले (विचृतौ) [अन्धकार से] छुड़ानेहारे (नाम) प्रसिद्ध (तारके) तारे [सूर्य और चन्द्रमा] (उदगाताम्) उदय हुए हैं। वे दोनों (क्षेत्रियस्य) शरीर वा वंश के दोष वा रोग के (अधमम्) नीचे और (उत्तमम्) ऊँचे (पाशम्) पाश को (वि+मुच्यताम्) छुड़ा देवें ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य और चन्द्रमा संसार में उदय होकर अपने ऊपर और नीचे के अन्धकार का नाश करके प्रकाश करते हैं, इसी प्रकार मनुष्य अपने छोटे और बड़े मानसिक, शारीरिक और वांशिक रोगों तथा दोषों को निवृत्त करके स्वस्थ और प्रतापी हों ॥१॥
टिप्पणी: १–उदगाताम्। उत्+इण् गतौ–लुङ्। इणो गा लुङि। पा० २।४।४५। इति गादेशः। उदितेऽभूताम्। भगवती। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् पा० ५।२।९४। इति भग–मतुप् नित्ययोगे। मस्य वः। ततो ङीप्। सुपां सुलुक्पूर्वसवर्ण०। पा० ७।१।३९। इति पूर्वसवर्णदीर्घः। भगवत्यौ। ऐश्वर्यवत्यौ। पूज्ये। विचृतौ। वि+चृती हिंसाग्रन्थनयोः–क्विप्। अन्धकाराद् विमोचयित्र्यौ। नाम। प्रसिद्धे। तारके। तरति तारयति वान्धकारात् तारका। तॄ–णिच्–ण्वुल्। टाप्। तारका ज्योतिषि। वा० पा० ७।३।४५। इति न अत इत्त्वम्। द्वे नक्षत्रे। ज्योतिषी। सूर्यचन्द्रौ। क्षेत्रियस्य। क्षेत्रियच् परक्षेत्रे चिकित्स्यः। पा० ५।२।९२। इति क्षेत्रियशब्दो निपात्यते परक्षेत्रे चिकित्स्य इत्यर्थे। यद्वा। क्षेत्र–घच् प्रत्ययः। परस्मिन् पुत्रपौत्रादिकस्य शरीरे प्रतीकार्यस्य महाप्रचण्डस्य रोगस्य। यद्वा। क्षेत्रे स्वकीये देहे वंशे वा जातस्य रोगस्य दोषस्य वा। विमुञ्चताम्। मुचेर्लोटि। शे मुचादीनाम्। पा० ७।१।५९। इति नुम्। विमोचयताम्। अधमम्। अधरशरीरस्थितम्। उत्तमम्। ऊर्ध्वभागे स्थितम्। पाशम्। पश बन्धे ग्रन्थे वा–घञ्। बन्धनम्। ग्रन्थिम् ॥
