0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - जो (मूलम्) मूल [तत्त्वज्ञान] (दिवः) सूर्यलोक से (अवततम्) नीचे को फैला हुआ है और जो (पृथिव्याः अधि) पृथिवी पर से (उत्ततम्) ऊपर को फैला है। [हे ईश्वर !] (तेन) उस (सहस्रकाण्डेन) सहस्रों शाखावाले [तत्त्वज्ञान] के द्वारा (विश्वतः) सब प्रकार से (नः) हमारी (परि) सब ओर (पाहि) रक्षा कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - सूर्य द्वारा वृष्टि, प्रकाश आदि भूमि पर आते और भूमि से जल सूर्यलोक वा मेघमण्डल में जाता और सब छोटे-बड़े लोक परस्पर आकर्षण और धारण रखते हैं। इसी प्रकार ईश्वरीय अनन्त नियमों को देखकर सब प्रजागण राजनियमों में चलकर परस्पर उपकार करें ॥३॥
टिप्पणी: ३–दिवः। द्युलोकात्। सूर्यमण्डलात्। मूलम्। मवते बध्नातीति। मूशक्यविभ्यः क्लः। उ० ४।१०८। इति मूङ् बन्धने–क्ल। अथवा। मूल प्रतिष्ठायां रोपणे वा–क। आदिकारणम्। तत्त्वज्ञानम्। अवततम्। अव+तनु विस्तारे–क्त। अधोमुखं प्रसृतम्। अधि। उपरि। उत्ततम्। उत्+तनु–क्त। ऊर्ध्वम्। उन्नतं विस्तृतम्। सहस्रकाण्डेन। क्वादिभ्यः कित्। उ० १।११५। इति कण शब्दे गतौ च–ड, डस्य नेत्त्वम्। अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति। पा० ६।४।१५। इति दीर्घः। अपरिमितपर्वयुक्तेन। विश्वतः। भीत्रार्थानां भयहेतुः। पा० १।४।२५। इत्यपादानसंज्ञायाम्। पञ्चम्यास्तसिल्। पा० ५।३।७। इति तसिल्। सर्वस्मात् कष्टात् ॥
