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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (च) और (यः) जो (सापत्नः) वैरियों का किया हुआ (शपथः) शाप [क्रोधवचन] (च) और (यः) जो (जाम्याः) कुलस्त्री का (शपथः) शाप है और (ब्रह्मा) वेदवेत्ता ब्राह्मण (मन्युतः) क्रोध से (यत्) जो कुछ (शापात्) शाप दे [क्रोधवचन कहे], (तत्) वह (सर्वम्) सब (नः) हमारे (अधस्पदम्) उद्योग के नीचे रहे ॥२॥
भावार्थभाषाः - यदि हमसे कोई वेदविरुद्ध खोटा कर्म हो जावे, जिससे हमारे शत्रु, हमारी स्त्रियाँ, हमारे ब्राह्मणादि विद्वान् लोग क्रुद्ध हों, तब हम पूरा-पूरा प्रयत्न करें कि हमारे शिष्टाचार और वैदिक कर्म से शापमोचन हो जावे, अर्थात् वे सब हमसे पूर्ववत् फिर प्रीति करने लगें ॥२॥
टिप्पणी: २–सापत्नः। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। इति सह+पत गतौ, ऐश्ये च–न प्रत्ययः, सहस्य सः। ततः सम्बन्धे–अण्। सपत्नसम्बन्धी। शात्रवः। शपथः। म० १। आक्रोशः। क्रोधवचनम्। जाम्याः। नियो मिः। उ० ४।४३। इति या गतौ–मि प्रत्ययः, यकास्य जकारः। याति कार्याणि सा जामिः स्वसा कुलस्त्री वा। अथवा। वसिवपियजि०। उ० ४।१२५। इति जम भक्षणे गतौ च–इञ्, अथवा। जन–इञ्। जामिरन्येऽस्यां जनयन्ति जामपत्यं जमतेर्वा स्याद् गतिकर्मणः–नि० ३।६। जाम्यतिरेकनाम बालिशस्य वासमानजातीयस्य वोपजनः–निरु० ४।२०। बालिशस्य मूर्खस्य, अथवा असमानजातीयस्य असपिण्डस्य। ब्रह्मा। अ० २।६।२। वेदवेत्ता। ब्राह्मणः। मन्युतः। पञ्चम्यास्तसिल्। पा० ५।३।७। इति तसिल्। क्रोधात्। नः। अस्माकम्। अधस्पदम्। अधःशिरसी पदे। पा० ८।३।४७। इति विसर्गस्य सत्वम्। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति पद स्थैर्ये, गत्यां च–अच्। पदम्=व्यवसायः, पादः, चिह्नम्–इति शब्दकल्पद्रुमे। पदस्य व्यवसायस्य उद्योगस्य अधस्ताद् अधोभागे, असमर्थं भवतु ॥
