मनुष्य सदैव उन्नति का उपाय करता रहे।
पदार्थान्वयभाषाः - (त्वष्टा) सूक्ष्म करनेवाले [सूक्ष्मदर्शी] पुरुष ने (पर्वते) बादल [के समान प्रकाश रोकनेवाले जनसमूह] में, अथवा पहाड़ पर (शिश्रियाणम्) ठहरे हुए (अहिम्) सर्परूप वा मेघरूप [हिंसक वा प्रकाश रोकनेवाले] को (अहन्) वध किया, (अस्मै) इस [प्रयोजन] के लिये (स्वर्यम्) ताप वा पीड़ा देनेवाला (वज्रन्) वज्र (ततक्ष) उसने तीक्ष्ण किया। (वाश्राः) रंभाती हुयी (धेनव इव) गौओं के समान, (स्यन्दमानाः) वेग से बहते हुए, (अञ्जः) प्रकट (आपः) जल [जलरूप प्रजागण] (समुद्रम्) समुद्र में [राजा के पास] (अव) उतरकर (जग्मुः) पहुँच गये ॥६॥
भावार्थभाषाः - पूर्वज विवेकी राजाओं ने दण्डव्यवस्था स्थापन करके अपने प्रकट और गुप्त शत्रुओं को मारा, तब प्रजागण प्रसन्न होकर उस हितकारी राजा को अभिनन्दन देने गये, जैसे रंभाती हुयी गौएँ बछड़ों के पास अथवा वृष्टि के जल एकत्र होकर समुद्र में दौड़कर जाते हैं, इसी प्रकार सब राजा और प्रजागण परस्पर रहकर आनन्द मनाते रहें ॥६॥ मनु जी ने कहा है–अ० ७ श्लोक १८। दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥१॥ दण्ड ही सब प्रजा पर शासन रखता, दण्ड ही सब ओर से रक्षा करता, दण्ड ही सोते हुओं में जागता है, विद्वान् लोग दण्ड को धर्म जानते हैं ॥