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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से आयु बढ़ावे।
पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (मणिः) प्रशंसनीय पदार्थ (कृत्यादूषिः) पीड़ा देनेहारी विरुद्ध क्रियाओं में दोष लगानेवाला, (अथो) और भी (अरातिदूषिः) अदानशीलों [कंजूसों] में दोष लगानेवाला है। (अथो) और भी (सहस्वान्) वही महाबली (जङ्गिडः) रोगभक्षक परमेश्वर वा औषध (नः) हमारे (आयूंषि) जीवनों को (प्र तारिषत्) बढ़तीवाला करे ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो कुचाली मनुष्य विरुद्ध मार्ग में चलते और सत्य पुरुषार्थों में आत्मदान अर्थात् ध्यान नहीं करते, वे ईश्वरनियम से महा दुःख उठाते हैं। सत्यपराक्रमी और पथ्यसेवी पुरुष उस महाबली परमेश्वर के गुणों के अनुभव से अपने जीवन को बढ़ाते हैं, अर्थात् संसार में अनेक प्रकार से उन्नति करके आनन्द भोगते और अपना जन्म सफल करते हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६–कृत्यादूषिः। विभाषा कृवृषोः। पा० ३।१।१२०। इति कृञ् हिंसायाम्–क्यप् तुक् च, टाप् च। अच इः। उ० ४।१३९। दुष वैकृत्ये–ण्यन्तात् इ प्रत्ययः। कृत्यायाः। हिंसाया दूषको निवारकः। अथो। ओत्। पा० १।१।१५। इति प्रगृह्यत्वात् सन्धिनिषेधः। अपि च। अरातिदूषिः। अरातिः। अ० १।२।२। न+रा दाने–क्तिच्। अरातयोऽदानकर्माणो वादानप्रज्ञा वा–निरु० ३।११। दूषिः–इति गतम्। अदातॄणां कृपणानां शत्रूणां दूषको नाशकः। आयूंषि। अ० १।३०।३। जीवनानि। प्र+तारिषत्। प्र पूर्वस्तरतिर्वृद्ध्यर्थः। लेट्। सिब् बहुलं लेटि। पा० ३।१।३५। इति सिप्। सिपो णिद्वद्भावाद् वृद्धिः। लेटोऽडाटौ। पा० ३।४।९४। आडागमः। इतश्च लोपः परस्मैपदेषु। पा० ३।४।९७। इकारलोपः। प्रवर्धयेत् ॥
