वांछित मन्त्र चुनें

दे॒वैर्द॒त्तेन॑ म॒णिना॑ जङ्गि॒डेन॑ मयो॒भुवा॑। विष्क॑न्धं॒ सर्वा॒ रक्षां॑सि व्याया॒मे स॑हामहे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

देवै: । दत्तेन । मणिना । जङ्गिडेन । मय:भुवा । विऽस्कन्धम् । सर्वा । रक्षांसि । विऽआयामे । सहामहे ॥४.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:2» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से आयु बढ़ावे।

पदार्थान्वयभाषाः - (देवैः) विद्वानों के (दत्तेन) दिये हुए [उपदेश किये हुए] (मणिना) मणि [अति श्रेष्ठ], (मयोभुवा) आनन्द के देनेहारे (जङ्गिडेन) रोगों के भक्षक [परमेश्वर वा औषध] द्वारा (विष्कन्धम्) विघ्न और (सर्वा=सर्वाणि) सब (रक्षांसि) राक्षसों को (व्यायामे) संग्राम में (सहामहे) हम दबावें ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सत्सङ्ग से दुःखनाशक परमेश्वर के उपकारों पर दृष्टि करके पुरुषार्थ के साथ पथ्य द्रव्यों का सेवन करके विघ्नकारी दुष्ट जीवों, पापों और रोगों को हटाकर सदा आनन्द में रहें ॥४॥
टिप्पणी: ४–देवैः। विद्वद्भिः। दत्तेन। दीयते इति। दा–क्त। कृतदानेन। उपदिष्टेन। मयोभुवा। अ० १।५।१। सुखस्य भावयित्रा, उत्पादकेन। व्यायामे। वि+आङ्+यम परिवेषणे–घञ्। मल्ल क्रीडाप्रदेशे। संग्रामे। सहामहे। अभिभवामः। अन्यद् व्याख्यातम्, म० १ ॥