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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से आयु बढ़ावे।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवैः) विद्वानों के (दत्तेन) दिये हुए [उपदेश किये हुए] (मणिना) मणि [अति श्रेष्ठ], (मयोभुवा) आनन्द के देनेहारे (जङ्गिडेन) रोगों के भक्षक [परमेश्वर वा औषध] द्वारा (विष्कन्धम्) विघ्न और (सर्वा=सर्वाणि) सब (रक्षांसि) राक्षसों को (व्यायामे) संग्राम में (सहामहे) हम दबावें ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सत्सङ्ग से दुःखनाशक परमेश्वर के उपकारों पर दृष्टि करके पुरुषार्थ के साथ पथ्य द्रव्यों का सेवन करके विघ्नकारी दुष्ट जीवों, पापों और रोगों को हटाकर सदा आनन्द में रहें ॥४॥
टिप्पणी: ४–देवैः। विद्वद्भिः। दत्तेन। दीयते इति। दा–क्त। कृतदानेन। उपदिष्टेन। मयोभुवा। अ० १।५।१। सुखस्य भावयित्रा, उत्पादकेन। व्यायामे। वि+आङ्+यम परिवेषणे–घञ्। मल्ल क्रीडाप्रदेशे। संग्रामे। सहामहे। अभिभवामः। अन्यद् व्याख्यातम्, म० १ ॥
