पाप के त्याग से सुखलाभ है, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋषयः) सूक्ष्मदर्शी पुरुष (घोराः) [पाप कर्मों पर] क्रूर होते हैं, (एभ्यः) उन [ऋषियों] को (नमः) अन्न वा नमस्कार (अस्तु) होवे, (यत्) क्योंकि (एषाम्) उन [ऋषियों] के (मनसः) मन की (चक्षुः) आँख (च) निश्चय करके (सत्यम्) यथार्थ [देखनेवाली] है। (महिष) हे पूजनीय परमेश्वर ! (बृहस्पतये) सब बड़े-बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी [आप] को (द्युमत्) स्पष्ट (नमः) नमस्कार है, (विश्वकर्मन्) हे संसार के रचनेवाले ! (नमस्ते) तेरेलिये नमस्कार है, (अस्मान्) हमारी (पाहि) रक्षा कर ॥४॥
भावार्थभाषाः - जिन महात्मा आप्त ऋषियों के मानसिक, वाचिक और कायिक कर्म, संसार को दुःख से मुक्त करने के लिये होते हैं, उनके उपदेशों को सब मनुष्य प्रीतिपूर्वक ग्रहण करें और जो परमेश्वर समस्त सृष्टि का कर्त्ता-धर्त्ता है, उसके उपकारों को हृदय में धारण करके उसकी उपासना करें और सदा पुरुषार्थ करके श्रेष्ठों की रक्षा करते रहें ॥४॥ (महिष) के स्थान पर सायणभाष्य में [महि सत्] दो पद हैं ॥