पाप के त्याग से सुखलाभ है, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋषयः) सूक्ष्मदर्शी ऋषिः (प्रजाः) मनुष्यादि प्रजाओं पर (अनुतप्यमानम्) अनुताप [अनुकम्पा] करनेवाले (यज्ञपतिम्) उत्तम कर्मों के रक्षक पुरुष को (एनसा) पाप से (निर्भक्तम्) पृथक् किया हुआ (आहुः) बताते हैं। उसने (यान्) जिन (मथव्यान्) मथने योग्य (स्तोकान्) प्रसन्न करनेवाले, सूक्ष्म विषयों को (अप) आनन्द से (रराध) सिद्ध किया है (विश्वकर्मा) संसार का रचनेवाला परमेश्वर (तेभिः=तैः) उन [सूक्ष्म विषयों] के साथ (नः) हमें (सं सृजतु) संयुक्त करे ॥२॥
भावार्थभाषाः - ऋषि लोग उस पुरुषार्थी पुरुष को निष्पाप और पुण्यात्मा मानते हैं, जो सब जीवों पर दया और उपकार करता है, वही धर्मात्मा, आप्तपुरुष, सत्य सिद्धान्तों को साक्षात् करके आनन्द से संसार में प्रकाशित करता है। (विश्वकर्मा) परमेश्वर उन अटल वैदिक धर्मों को हम सबके हृदय में स्थापित करे, जिससे हम पुरुषार्थपूर्वक सदा आनन्द भोगें ॥२॥