बन्ध से मुक्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रजानन्तः) बड़े ज्ञानवाले (पूर्वे=पूर्वे वर्त्तमानाः+भवन्तः) प्रथम स्थान में वर्त्तमान महात्मा पुरुष आप (अङ्गेभ्यः) सबके अङ्गों के हित के लिये (परि) सब ओर (आचरन्तम्) चलनेवाले (प्राणम्) अपने प्राण [बल] को (प्रति) प्रत्यक्ष (गृह्णन्तु) ग्रहण करें। [हे मनुष्य !] (दिवम्) ज्ञानप्रकाश वा व्यवहार को (गच्छ) प्राप्त कर, (शरीरैः) सब अङ्गों के साथ (प्रति तिष्ठ) तू प्रतिष्ठित रह, (देवयानैः) देवताओं के चलने योग्य (पथिभिः) मार्गों से (स्वर्गम्) स्वर्ग [महा आनन्द] में (याहि) तू पहुँच ॥५॥
भावार्थभाषाः - ज्ञानी महात्मा पुरुष जो श्वास लें, वह संसार के उपकार के लिये ही लें अर्थात् प्रतिक्षण परोपकार में लगकर अपना सामर्थ्य और जीवन बढ़ावें और प्रत्येक मनुष्य को योग्य है कि अपने आत्मा में ज्ञान का प्रकाश करके सब व्यवहारों में चतुर हो और आँख, कान, हाथ, पग आदि अङ्गों से शुभ कर्म करके प्रतिष्ठा बढ़ावे और जिन वेदमार्गों पर देवता चलकर स्वर्ग भोगते हैं, उन्हीं वेदरूपी राजपथों पर चलकर जीवन्मुक्त होकर आनन्द भोगें ॥५॥