बन्ध से मुक्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (ग्राम्याः) ग्राम में बसनेवाले, (विश्वरूपाः) सब वर्णवाले (पशवः) जीव (बहुधा) प्रायः (विरूपाः) पृथक्-पृथक् रूपवाले (सन्तः) होकर (एकरूपाः) एक स्वभाववाले हैं, (तान्) उन (अग्रे=अग्रे वर्त्तमानान् पशून्) अग्रवर्त्ती जीवों को (वायुः) सर्वव्यापी वा बलदायक (देवः) प्रकाशस्वरूप, (प्रजापतिः) प्रजाओं का रक्षक परमेश्वर (प्रजया) प्रजा [अपने जनों] से (संरराणः=संरममाणः) आनन्द करता हुआ (प्र) भले प्रकार (मुमोक्तु) मुक्त करे ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो (ग्राम्याः) मिलकर भोजन करनेवाले मनुष्य भिन्न देश, भिन्न अन्न, जल, वायु होने से भिन्नवर्ण होकर भी एक ईश्वर की आज्ञापालन में (एकरूप) तत्पर रहते हैं, परमेश्वर प्रसन्न होकर उन पुरुषार्थी महात्माओं को दुःख से छुड़ाकर सदा आनन्द देता है ॥४॥ २–शुद्धवायु सब प्राणियों को शारीरिक और आत्मिक सुख देता है ॥४॥