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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कीड़ों के समान दोषों का नाश करे, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरे (शृङ्गे) दो सीङ्गों को (प्र+शृणामि) मैं तोड़े डालता हूँ, (याभ्याम्) जिन दोनों से (वितुदायसि) तू सब ओर टक्कर मारता है। (ते) तेरे (कुषुम्भम्) जलपात्र को (भिनद्मि) तोड़ता हूँ (यः) जो (ते) तेरे (विषधानः) विष की थैली है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे दुष्ट वृषभ अपने सींगों से अन्य जीवों को सताता है, इसी प्रकार जो क्षुद्र क्रिमियों के समान आत्मदोष दिन-रात कष्ट देते हैं, उनको और उनके कारणों को खोजकर नष्ट करना चाहिये ॥६॥ (कुषुम्भम्) के स्थान पर सायणभाष्य में (षुकम्भम्) पद है ॥
टिप्पणी: ६–ते। तव। शृणामि। भिनद्मि। शृङ्गे। शृणातेर्हस्वश्च। उ० १।१२६। इति शॄ हिंसायाम्–गन्, धातोर्ह्रस्वत्वं कित्वं नुट् च प्रत्ययस्य। शृङ्गं श्रयतेर्वा शृणातेर्वा शम्नातेर्वा शरणायोद्गतमिति वा शिरसो निर्गतमिति वा–निरु० २।७। द्वे विषाणे। वि–तुदायसि। तुद व्यथने–शस्य शायजादेशः। विशेषेण तुदसि। व्यथयसे। भिनद्मि। भिदिर् विदारणे। विदारयामि। कुषुम्भम्। कुसेरुम्भोमेदेताः। उ० ४।१०६। इति कुष निष्कर्षे, वा, कुस श्लेषे–उम्भ प्रत्ययः। सकारषकारयोरेकत्वम्। कुसुम्भः=कमण्डलुः जलपात्रम्। शरीरे जलनाडीविशेषम्। विषधानः। करणाधिकरणयोश्च। पा० ३।३।११७। इति विष+डुधाञ् धारणपोषणयोः–अधिकरणे ल्युट्। विषं धीयतेऽत्र। विषस्थानम् ॥
