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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कीड़ों के समान दोषों का नाश करे, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस [क्रिमी] के (वेशसः) मुख्य सेवक (हतासः=हताः) नष्ट हों और (परिवेशसः) साथी भी (हतासः) नष्ट हों। (अथो=अथ–उ) और भी (ये) जो (क्षुल्लकाः इव) बहुत सूक्ष्म आकारवाले से हैं, (ते) वे (सर्वे) (क्रिमयः) कीड़े (हताः) नष्ट हों ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अपनी स्थूल और सूक्ष्म कुवासनाओं का और उनकी सामग्री का सर्वनाश कर दे, जैसे रोगजनक जन्तुओं को औषध आदि से नष्ट करते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५–हतासः। असुक् आगमः। हताः। वेशसः। मिथुनेऽसिः। उ० ४।२२३। इति बाहुलकाद् अमिथुनेऽपि। विश–असि प्रत्ययः। प्रवेशकाः। मुख्यसेवकाः। परिवेशसः। परितः स्थिताः। अनुचराः। अथो। अपि च क्षुल्लकाः। क्षुद्+लकाः। क्षुद्रि संपेषणे–क्विप्+लक आस्वादे, प्राप्तौ–अच्। तोर्लि। पा० ८।४।६०। इति परसवर्णः। क्षुदं क्षुद्रत्वं लाकयन्ति प्राप्नुवन्ति ते क्षुल्लकाः। सूक्ष्माकाराः क्षुद्रजन्तवः। अन्यद् व्याख्यातम् ॥
