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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इयम्) यह (पतिकामा) पति की कामना करती हुई कन्या (आ+अगन्=आगमत्) आयी है और (जनिकामः) पत्नी की कामनावाला (अहम्) मैं (आ+अगमम्) आया हूँ। (अहम्) मैं (भगेन) ऐश्वर्य के (सह) साथ (आ+अगमम्) आया हूँ। (यथा) जैसे (कनिक्रदत्) हींसता हुआ (अश्वः) घोड़ा ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे बलवान् घोड़ा मार्गगमन, अन्न, घास आदि भोजन के समय हिनहिनाकर प्रसन्नता प्रकट करता है, इसी प्रकार विद्या समाप्ति पर पूर्ण विद्वान् और समर्थ कन्या और वर गृहाश्रम में प्रवेश करके आनन्द भोगते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५–इयम्। कमनीया कन्या। आ+अगन्। गमेर्लुङि तिपि च्लेर्लुकि। मो नो धातोः। पा० ८।२।६४। इति नत्वम्। आगमत्। पतिकामा। भर्त्तारमिच्छन्ती। जनिकामः। जनिघसिभ्यामिण्। उ० ४।१३०। इति जन जनने वा जनी प्रादुर्भावे–इण्। जनिवध्योश्च। पा० ७।३।३५। इति वृद्धिनिषेधः। जनयति वीरपुत्रान् जायते सुखमनया सा जनिर्जाया। तां कामयमानः। अहम्। वरः। आ+अगमम्। आगतवानस्मि। अश्वः। अ० १।१६।४। तुरङ्गः। कनिक्रदत्। दाधर्त्तिदर्द्धर्त्ति०। पा० ७।४।६५। इति क्रन्द आह्वाने यङि शत्रन्तो निपातितः। भृशं हेषां कुर्वन्। भगेन। भजनीयेन पत्नीरूपैश्वर्येण। सह। सङ्गतः ॥
