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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे वर ! (यत्) जो कुछ प्रीतिभाव आदि] (अन्तरम्) भीतर [तेरे हृदय में] है, (तत्) वह (बाह्यम्) बाहिर [कन्या को प्रकट] हो और (यत्) जो कुछ [प्रीतिभाव] (बाह्यम्) बाहिर [प्रकट किया जाय,] (तत्) वह (अन्तरम्) भीतर [कन्या के हृदय में स्थिर हो] (ओषधे) हे तापनाशक [ओषधिरूप वर] (विश्वरूपाणाम्) सर्वसुन्दरी (कन्यानाम्) कन्याओं [कन्या] के (मनः) मन को (गृभाय) ग्रहण कर ॥४॥
भावार्थभाषाः - वर हार्दिक प्रीति से कन्या के साथ व्यवहार करे और पत्नी भी पति से हार्दिक प्रीति रक्खे। इस प्रकार परस्पर प्रसन्नता से गृहलक्ष्मी बढ़ेगी और नित्यप्रति आनन्द रहेगा। (कन्यानाम्) बहुवचन एक के लिये आदरार्थ है और मन्त्र में जो वर को उपदेश है, वही कन्या के लिये भी समझना चाहिये ॥४॥
टिप्पणी: ४–यत्। किञ्चित्, प्रीतिभावः। शुभविचारः। अन्तरम्। अन्त+रा–क। अन्तं राति ददाति। मध्यम्। अन्तर्धानम्। आत्मीयम्। बाह्यम्। दित्यदित्यादित्य०। पा० ४।१।८५। अत्र वार्त्तिकम्। बहिषष्टिलोपो यञ् च। इति बहिस्–यञ्, टिलोपश्च। बहिष्ठम्। प्रकटम्। कन्यानाम्। अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति कनी दीप्तिकान्तिगतिषु–यच्, टाप् च। आदरार्थं बहुवचनम्। दीप्यमानायाः। कमनीयायाः। कुमार्याः। विश्वरूपाणाम्। सर्वाङ्गसुन्दरीणाम्। मनः। चित्तम्। गृभाय। छन्दसि शायजपि। पा० ३।१।८४। इति ग्रहे लोटि श्नः शायजादेशः। हस्य भः। गृहाण। ओषधे। अ० १।२३।१। हे तापनाशक। ओषधिरूपवर ॥
