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अ॑रु॒स्राण॑मि॒दं म॒हत्पृ॑थि॒व्या अध्युद्भृ॑तम्। तदा॑स्रा॒वस्य॑ भेष॒जं तदु॒ रोग॑मनीनशत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अरु:ऽस्राणम् । इदम् । महत् । पृथिव्या: । अधि । उत्ऽभृतम् । तत् । आऽस्रावस्य । भेषजम् । तत् । ऊं इति । रोगम् । अनीनशत् ॥३.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:2» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:5


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शारीरिक और मानसिक रोग की निवृत्ति के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इदम्) यह (अरुस्राणम्) फोड़े को पकाकर भरनेवाला (महत्) उत्तम [औषध] (पृथिव्याः) पृथिवी से (अधि) ऊपर (उद्भृतम्) निकालकर लाया गया है। (तत्) वही [ज्ञान] (आस्रावस्य) बड़े क्लेश का (भेषजम्) औषध है, (तत्) उसने (उ) ही (रोगम्) रोग को (अनीनशत्) नाश कर दिया है ॥५॥
भावार्थभाषाः - महाक्लेशनाशक ब्रह्मज्ञानरूप औषध पृथिवी आदि लोकों के प्रत्येक पदार्थ में वर्त्तमान है, मनुष्य उसको प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करें और रोगों की निवृत्ति करके स्वस्थचित्त होकर आनन्दित रहें ॥५॥
टिप्पणी: ५–अरुस्राणम्। म० ३। अरुषः पाचयितृ। पृथिव्याः। अ० १।२।१। विस्तीर्णाद् भूलोकात्। उद्भृतम्। उत्–भृञ्–क्त। उद्धृतम्। उन्मूलितम्। सर्वथा ज्ञाने प्राप्तम्। अन्यद् व्याख्यातं म० ३ ॥