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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शारीरिक और मानसिक रोग की निवृत्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (असुराः) बुद्धिमान् पुरुष (इदम्) इस (अरुस्राणम्) व्रण [स्फोर=फोड़े] को पकाकर भर देनेवाली, (महत्) उत्तम औषध को (नीचैः) नीचे-नीचे (खनन्ति) खोदते जाते हैं। (तत्) वही विस्तृत ब्रह्म (आस्रावस्य) बड़े क्लेश की (भेषजम्) औषध है, (तत्) उसने (उ) ही (रोगम्) रोग को (अनीनशत्) नाश कर दिया है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे सद्वैद्य बड़े-बड़े परिश्रम और परीक्षा करके उत्तम औषधों को लाकर रोगों की निवृत्ति करके प्राणियों को स्वस्थ करते हैं, वैसे ही विज्ञानियों ने निर्णय किया है कि उस परमेश्वर ने आदि सृष्टि में ही मानसिक और शारीरिक रोगों की ओषधि उत्पन्न कर दी है ॥३॥
टिप्पणी: टिप्पणी–सायणभाष्य में (अनीनशत्) के स्थान में [अशीशमत्] पाठ है ॥ ३–नीचैः। नौ दीर्घश्च उ० ५।१३। इति नि+चि चयने–डैसि, नेर्दीर्घत्वं च। अधोऽधः। अन्तरन्तः। खनन्ति। खनु अवदारणे। अवदारयन्ति, उन्मूलयन्ति। अन्वेषणेन प्राप्नुवन्ति। असुराः। अ० १०।१।१। असेरुरन्। उ० १।४२। इति असु क्षेपणे, यद्वा, अस गतिदीप्त्यादानेषु–उरन्। यद्वा, असुः, प्राणः, रो मत्वर्थीयः। ज्ञानवन्तः। दीप्यमानाः। प्रज्ञावन्तः–निरु० १०।३४। प्राणवन्तः पुरुषाः। अरुस्राणम्। अरुः–स्राणम्। अर्त्तिपॄवपियजि०। उ० २।११७। इति ऋ गतौ, हिंसायां वा–उसि। इति अरुः, व्रणः। स्रै पाके–ल्युट्। अरुषो व्रणस्य पाककरम्। महत्। अ० १।१०।४। विपुलम्। आस्रावस्य। अ० १।२।४। महाक्लेशस्य। रोगम्। पदरुजविशस्पृशो घञ्। पा० ३।३।१६। रुजो भङ्गे–घञ्। व्याधिम्। उपतापम्। अनीनशत्। इति णश अदर्शने, नाशे च–ण्यन्तात् लुङि चङि रूपम्। नाशयति स्म ॥
