मनुष्य अपनी उन्नति करता रहे, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (विद्धः) सेवा किये हुए (इन्द्रः) परमेश्वर ने (एताम्) इस (अजराम्) अक्षय (ऊर्जाम्) अन्नयुक्त (स्वधाम्) अमृत को (अग्रे) पहिले से (ससृजे) उत्पन्न किया है। (सा एषः) सो यह (ते) तेरेलिये [है], (तया) उस [अमृत] से (त्वम्) तू (सुवर्चाः) उत्तमकान्तिवाला होकर (शरदः) बहुत शरद् ऋतुओं तक (जीव) जीता रह, (आ) और [सा स्वधा] [वह] (ते) तेरेलिये (मा सुस्रोत्) न घट जावे। (भिषजः) वैद्यों ने (ते) तेरेलिये [उस अमृत को] (अक्रन्) बनाया है ॥७॥
भावार्थभाषाः - अनादि परमेश्वर ने सृष्टि के पहिले मनुष्य को अमृतरूप सार्वभौम ज्ञान दिया है, उसकी कभी हानि नहीं होती, मनुष्य जितना-जितना उसे काम में लाता है, उतना ही वह बढ़ता जाता है और सुखदायक होता है। उसके उचित प्रयोग से मनुष्य पूर्ण आयु भोगता है। बुद्धिमानों ने बुद्धि को महौषधि बनाया है ॥७॥ (ऊर्जाम्) पद के स्थान पर सायणभाष्य में (ऊर्जम्) है ॥