मनुष्य अपनी उन्नति करता रहे, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) यह [जीव] (इन्द्रेण) बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा करके (दत्तः) दिया हुआ, (वरुणेन) श्रेष्ठ गुणवाले पिता करके (शिष्टः) शिक्षा किया हुआ और (मरुद्भिः) शूरवीर महात्माओं करके (प्रहितः) भेजा हुआ, (उग्रः) तेजस्वी होकर, (नः) हम लोगों में (आ अगन्=अगमत्) आया है। (द्यावापृथिवी=०–व्यौ) हे सूर्य और भूमि ! (वाम्) तुम दोनों की (उपस्थे) गोद में [यह जीव] (मा क्षुदत्) न भूखा रहे और (मा तृषत्) न पियासा मरे ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने अपनी न्यायव्यवस्था से इस जीव को मनुष्यजन्म दिया है, माता-पिता ने शिक्षा दी है, विद्वानों ने उत्तम विद्याओं का अभ्यास कराया है, इस प्रकार यह अध्ययनसमाप्ति पर समावर्त्तन करके संसार में प्रवेश करे और सूर्य पृथिवी आदि सब पदार्थों से उपकार लेकर आनन्द भोगे ॥४॥