मनुष्य अपनी उन्नति करता रहे, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (नः) हमारे लिये (आशीः) आशीर्वाद [हो], (सचेतसौ) हे समान चित्तवाले [माता-पिता तुम दोनों] ! (ऊर्जम्) अन्न, (सौप्रजास्त्वम्=०–जस्त्वम्) उत्तम प्रजाएँ, (दक्षम्) बल, (उत) और (द्रविणम्) धन (धत्तम्) दान करो ॥ (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर (अयम्) यह [जीव] (सहसा) [आपके] बल से (जयम्) जय और (क्षेत्राणि) ऐश्वर्य के कारण खेतों को (कृण्वानः) करता हुआ और (अन्यान्) जीवित [वा भिन्न-भिन्न] (सपत्नान्) विपक्षियों को (अधरान्) नीचे [करता हुआ] [जीवाति=जीता रहे–मं० २ से] ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में (जीवाति) जीता रहे, इस पद की अनुवृत्ति मं० २ से है। माता-पिता प्रयत्न करें कि उनके पुत्र-पुत्री सब सन्तान, बड़े अन्नवान्, बलवान् और धनवान् होकर, उत्तम गृहस्थी बनें और जितेन्द्रिय होकर अपने दोषों और शत्रुओं का नाश करें ॥३॥