बुद्धि से विवाद करे, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नितत्त्व, (वरुण) हे जलतत्त्व ! (राजन्) हे बड़ी शक्तिवाले (मित्र) चेष्टा करानेवाले प्राणवायु ! (इमम्) इस पुरुष को (आयुषे) आयु [बढ़ाने] के लिये और (वर्चसे) तेज वा अन्न के लिये (प्रियम्) प्रसन्न करनेवाला (रेतः) वीर्य वा सामर्थ्य (नय) प्राप्त करा। (अदिते) हे अदीन वा अखण्ड प्रकृति वा भूमि ! (माता इव) माता के समान (अस्मै) इस जीव को (शर्म) आनन्द (यच्छ) दान कर। (विश्वे) हे सब (देवाः) दिव्य पदार्थ वा महात्माओं ! (यथा) जिससे [यह पुरुष] (जरदष्टिः) स्तुति के साथ प्रवृत्ति वा भोजनवाला (असत्) होवे ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अग्नि, जल, वायु और पृथिवी तत्त्वों को प्रयत्नपूर्वक उचित खान-पान ब्रह्मचर्यादि के नियमपालन से अनुकूल रक्खे, जिससे शरीर की पुष्टि और आत्मा की उन्नति करके उत्साही और यशस्वी होवे ॥५॥