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तया॒हं शत्रू॑न्त्साक्ष॒ इन्द्रः॑ सालावृ॒काँ इ॑व। प्राशं॒ प्रति॑प्राशो जह्यर॒सान्कृ॑ण्वोषधे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तया । अहम् । शत्रुन् । साक्षे । इन्द्र: । सालावृकान्ऽइव । प्राशम् । प्रतिऽप्राश: । जहि । अरसान् । कृणु । ओषधे ॥२७.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:2» सूक्त:27» पर्यायः:0» मन्त्र:5


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

बुद्धि से विवाद करे, इसका उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं (तया) उस [ओषधिरूप बुद्धि] से (शत्रून्) वैरियों को (साक्षे) हरा दूँ, (इन्द्रः) ऐश्वर्यशाली [गृहपति] (सालावृकान् इव) जैसे घर के भेड़ियों, कुत्ते, विलाव आदिकों को। (प्राशम्) मुझ वादी के (प्रतिप्राशः) प्रतिवादियों को (जहि) मिटा दे, (ओषधे) हे ताप को पी लेनेवाली [ओषधि के समान बुद्धि ! उन सबको] (अरसान्) फींका (कृणु) कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे ओषधिबल से रोग निवृत्त होता है, वैसे ही मनुष्य बुद्धिबल से, अपने दोषों और शत्रुओं का नाश करके आनन्द लाभ करें ॥५॥
टिप्पणी: ५–तया। पाटया। तत्प्रभावेन। शत्रून्। वैरिणः। साक्षे। षह अभिभवे–लेटि उत्तमे। अभिभवामि। असत्प्रायान् करोमि। सालावृकान्। सालायां गृहे वृक इव। शालावृकान्। कुक्कुरान् विडालान्। अन्यद् गतम् ॥