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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं के नाश के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] (एनान्) इन (जीवितयोपनान्) प्राणों के मोहनेवाले (कण्वान्) पापरोगों को (पराचः) ओंधे मुख (प्र णुद) ढकेल दे। (यत्र) जहाँ (तमांसि) अन्धकार (गच्छन्ति) व्याप्त रहते हैं, (तत्=तत्र) वहाँ (क्रव्यादः) माँस खानेवाले [रोगों] को (अजीगमम्) मैंने पहुँचा दिया है ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे राजा महापापी दुराचारी पुरुष को बन्ध करके अन्धेरे करागार में डाल देता है, इसी प्रकार पुरुषार्थी पुरुष व्यायाम करने और पथ्य पदार्थों के सेवन से आलस्य, ज्वर आदि शारीरिक रोगों को मिटाकर अविद्यादि मानसिक रोगों का नाश करें ॥५॥
टिप्पणी: ५–पराचः। परा प्रातिलोम्ये, अनादरे, न्यग्भावे, तत्पूर्वाद् अञ्चु गतिपूजनयोः–क्विन्, शसि रूपम्। पराङ्मुखान्, विमुखान्। एनान्। समीपस्थान्। अस्माकं कुसंस्कारोत्पन्नान्। प्र+नुद। णुद प्रेरणे। प्रेरय। अपसारय। तमांसि। तमिर् खेदे, इच्छायाम्–असुन्। क्लेशहेतुकाः। अन्धकाराः। यत्र। यत् स्थानम्। गच्छन्ति। व्याप्नुवन्ति। तत्। निःसूर्यस्थानम्। क्रव्यादः। क्लव भये–यत्। रलयोरेकत्वात्। क्रव्ये च। पा० ३।२।६९। क्रव्योपदाद् अद भक्षणे–विट्। मांसभक्षकान् कुष्ठादिरोगान्। अजीगमम्। गमेर्ण्यन्तात् लुङि चङि रूपम्। अहं प्रेरितवानस्मि ॥
