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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं के नाश के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पृश्निपर्णि) हे सूर्य वा पृथिवी की पालनेवाली [अथवा सूर्य वा पृथिवी जैसे पत्तेवाली ओषधिरूप परमेश्वरशक्ति] (अरायम्) निर्धनता को, (च) और (यः) जो [रोग] (स्फातिम्) बढ़वार को (जिहीर्षति) छीनना चाहे, [उस] (असृक्पावानम्) रक्त पीनेवाले और (गर्भादम्) गर्भ खानेवाले [गर्भाधानशक्ति नाश करनेवाले] (कण्वम्) पाप [रोग] को (सहस्व) जीत ले (च) और (नाशय) मिटा दे ॥३॥
भावार्थभाषाः - जिन आलस्यादि दोषों और ब्रह्मचर्यादि खण्डनरूप कुकर्मों से हम धनहीन, तनक्षीण, मनमलीन होकर वंशच्छेद करें, ऐसे दोषों को हम सर्वथा त्यागें और उस (पृश्निपर्णी) सूर्यादि जगत् के रक्षक, पोषक, अखण्डव्रत परमात्मा का ध्यान करके विद्यावृद्धि, धनवृद्धि और कुलवृद्धि करके आनन्द भोगें ॥३॥
टिप्पणी: ३–अरायम्। रा दानादानयोः–घञ् युक् आगमः। नञ्समासः। निर्धनताम्। असृक्पावानम्। असु क्षेपे, यद्वा असञ् दीप्तिग्रहणगतिषु–ऋजिप्रत्ययः। अस्यते क्षिप्यते नाडीभिः। यद्वा असति शरीरं येन, यद्वा गृह्णाति गच्छति वा यत्तद् असृक्, रक्तम्। आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। पा० ३।२।७४। इति पा पाने वनिप्। रुधिरस्य पानशीलं नाशकम्। स्फातिम्। स्फायी वृद्धौ–क्तिन्। वृद्धिम्। जिहीर्षति। हृञ् हरणे–सनि लट्। हर्तुं नाशयितुमिच्छति उपक्रमते। गर्भादम्। अदोऽनन्ने। पा० ३।२।६८। इति गर्भ+अद भक्षणे–विट्। गर्भस्य भक्षकम्। कण्वम्। व्याख्यातम् (कण्वजम्भनी) इति शब्दे–म० १। कण्यते अपोद्यते इति कण्वं पापम्। अर्शआदिभ्योऽच् पा० ४।२।१२७। इति मत्वर्थे अच्। पापयुक्तं दुःखकरं रोगम्। नाशय। मारय। पृश्निपर्णि। म० १। सहस्व। अभिभव ॥
