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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कुप्रयोग त्याग के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आपः) हे जलो ! (यत्) जो (वः) तुम्हारा (तेजः) तेज है, (तेन) उससे (तम्) उस [दोष] को (अतेजसम्) निस्तेज (कृणुत) कर दो, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करे, [अथवा] (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान ॥५॥
