0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वायो) हे पवन [पवन तत्त्व] (यत्) जो (ते) तेरी (अर्चिः) दीपनशक्ति है, (तेन) उससे (तम् प्रति) उस [दोष] पर (अर्च) प्रदीप्त हो (यः) जो (अस्मान्) हमसे..... मन्त्र १ ॥३॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान ॥३॥
टिप्पणी: ३–वायो। कृवापाजिमि०। उ० १।१। इति वा गतिगन्धनयोः–उण्। आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७।३।३३। इति युक्। वायुर्वातेर्वेतेर्वा स्याद् गतिकर्मणः–निरु० १०।१। हे पवन ! अन्यद् गतम्, सू० १९ ॥ २, ३, ४, ५–उपरि व्याख्याताः ॥
