परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है, इसका उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गन्धर्वः) गन्धर्व [म० १] (आभिः) इन (अनवद्याभिः) निर्दोष [अप्सराओं] के साथ (उ) अवश्य (संजग्मे) संगतिवाला था और (अप्सरासु) अप्सराओं में [सब प्राणियों, वा अन्तरिक्ष वा बीजरूप जल में व्यापक, वा उत्तमरूपवाली अपनी शक्तियों में] (अपि) निःसन्देह (आसीत्) वर्त्तमान था। (आसाम्) इन [अप्सराओं] का (सदनम्) घर (समुद्रे) अन्तरिक्ष में [वा समुद्ररूप गम्भीर स्थान में] (मे) मुझको (आहुः) वे बताते हैं, (यतः) जिस स्थान से वे (च) अवश्य (आ यन्ति) आती (च) और (परा=परायन्ति) दूर चली जाती हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - (गन्धर्व) भूमि आदि लोकों और वेदवाणी का धारक (अप्सराओं) अर्थात् सब प्राणियों और जल आदि सृष्टि के उपादान कारण पदार्थों में वर्त्तमान अपनी शक्तियों के साथ विराजमान रहता है, ये अद्भुत शक्तियाँ अति विस्तीर्ण आकाश में वर्त्तमान रहती और मनुष्य आदि के शरीरों में परमाणुओं की संयोगदशा में दृश्य और उनकी वियोगदशा में अदृश्य हो जाती हैं ॥३॥ टिप्पणी–(गन्धर्वः) और (अप्सरसः) शब्दों के लिये यजुर्वेद अ० १८ म० ३८–४३, छह मन्त्र देखें। वहाँ (अप्सरसः) शब्द है, जो (अप्सराः) शब्द का पर्य्यायवाची है। ऋ॒ता॒षाडृ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वस्तस्यौष॑धयोऽप्स॒रसो॒ मुदो नाम॑। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ताभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥१॥ (ऋताषाट्) सत्यनियम का सहनेवाला, (ऋतधामा) सत्य प्रभाववाला, (अग्निः) सर्वव्यापक, वा अग्निसमान रक्षक, परमेश्वर (गन्धर्वः) सूर्य, पृथिवी और वेदवाणी आदि का धारण करनेवाला है। (तस्य) उसको [गन्धर्व की बनायी] (मुदः) आनन्द देनेवाली (औषधयः) ओषधें [अन्नादि वस्तुएँ] (नाम) प्रसिद्धरूप से (अप्सरसः) अप्सराएँ अर्थात् आकाश, वा प्राणों, व जल में चलनेवाली वा उत्तमरूपवाली सामग्री हैं। (सः) वह परमेश्वर (नः) हमारे लिये (इदम्) इस (ब्रह्म) ब्राह्मणकुल और (क्षत्रम्) क्षत्रियकुल की (पातु) रक्षा करे। (तस्मै) उस परमेश्वर को (स्वाहा) सुन्दर वाणी और (वाट्) आवाहन और (ताभ्यः) उन सामग्रियों के लिये (स्वाहा) सुन्दर स्तुति है ॥ यह मन्त्र ३८ वाँ है। इसी प्रकार अन्य पाँच मन्त्रों में (गन्धर्वः) शब्द (सूर्यः, चन्द्रमाः, वातः, यज्ञः, मनः) शब्दों के साथ और (अप्सरसः) शब्द (मरीचयः, नक्षत्राणि, आपः, दक्षिणाः, ऋक्सामानि) शब्दों के साथ क्रम से आये हैं ॥