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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि [अग्नि पदार्थ] (यत्) जो (ते) तेरा (तेजः) तेज है, (तेन) उससे (तम्) उस [दोष] को (अतेजसम्) निस्तेज (कृणु) कर दे, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करता है, [अथवा] (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान ॥५॥
टिप्पणी: ५–तेजः। अ० १।३५।३। तिज निशाने, तेज निशानपालनयोः–असुन्। कान्तिः। अतेजसम्। तिज, तेज–असुन्। नञ्समासः। कान्तिरहितम्। निस्तेजस्कम्। कृणु। कुरु ॥
