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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि (यत्) जो (ते) तेरी (शोचिः) शोधनशक्ति है, (तेन) उससे (तम्) उस [दोष] को (प्रति शोच) शुद्ध कर दे, (यः) जो (अस्मान्) हमसे..... मन्त्र १ ॥४॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान ॥४॥
टिप्पणी: ४–शोचिः। अर्चिशुचि०। उ० २।१०८। इति ईशुचिर् शौचविशरणयोः–इसि। ज्वलतो नाम–निघ० १।१७। शुच्यत्यनेनेति। शोधनसामर्थ्यम्। शोच। शोचय, शोधय ॥
