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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि (यत्) जो (ते) तेरी (अर्चिः) दीपनशक्ति है, (तेन) उससे (तम् प्रति) उस [दोष] पर (अर्च) प्रदीप्त हो, (यः) जो (अस्मान्) हमसे..... मन्त्र १ ॥३॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान ॥३॥
टिप्पणी: ३–अर्चिः। अर्चिशुचिहुसृपिछादिछर्दिभ्य इसिः। उ० २।१०८। इति अर्च पूजाप्रकाशयोः–इसि। ज्वलतो नाम–निघ० १।१७। दीपनम्। ज्वाला। अर्च। ज्वलितो भव। दीप्यस्व ॥
