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स॑पत्न॒क्षय॑णमसि सपत्न॒चात॑नं मे दाः॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सपत्नऽक्षयणम् । असि । सपत्नऽचातनम् । मे । दा: । स्वाहा ॥१८.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:2» सूक्त:18» पर्यायः:0» मन्त्र:2


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शत्रुओं से रक्षा करनी चाहिये–इसका उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे ईश्वर !] तू (सपत्नक्षयणम्) प्रकट शत्रुओं की नाशशक्ति (असि) है, (मे) मुझे (सपत्नचातनम्) प्रकट शत्रुओं के मिटाने का बल (दाः) दे, (स्वाहा) यह सुन्दर आशीर्वाद हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे ईश्वर वा राजा प्रकट कुचालियों का नाश करता है, वैसे ही मनुष्य अपने प्रकट दोषों का नाश करके सुख भोगे ॥२॥
टिप्पणी: २–सपत्नक्षयणम्। सह+पत गतौ, ऐश्ये–न, सहस्य सः। एकार्थे पतन्ति यतन्ते ते सपत्नाः। तेषां प्रकटशत्रूणां क्षयणं नाशनम्। अन्यद् गतम् ॥