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सूर्य॒ चक्षु॑षा मा पाहि॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सूर्य । चक्षुषा । मा । पाहि । स्वाहा ॥१६.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:2» सूक्त:16» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आत्मरक्षा के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्य) हे सूर्य, तू (चक्षुषा) दृष्टि के साथ (मा) मेरी (पाहि) रक्षा कर, (स्वाहा) यह सुवाणी हो ॥३॥
भावार्थभाषाः - सूर्य प्रकाश का आधार है और उसी से नेत्र में ज्योति आती है। मनुष्य को सूर्य के समान अपनी दर्शनशक्ति संसार में स्थिर रखनी चाहिये ॥३॥
टिप्पणी: ३–सूर्य। अ० १।३।५। हे सर्वप्रेरक ! हे आदित्य ! चक्षुषा। अ० १।३३।४। चक्षिङ् कथने दर्शने च–उसि। नेत्रेण। रूपदर्शनशक्त्या ॥