पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मरक्षा के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (द्यावापृथिवी=०–व्यौ) हे आकाश और [पृथिवी !] दोनों (उपश्रुत्या) पूर्ण श्रवणशक्ति के साथ (मा) मेरी (पातम्) रक्षा करो, (स्वाहा) यह सुवाणी [सुन्दर आशीर्वाद] हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - सब दिशाओं में मनुष्य को अपनी श्रवणशक्ति बढ़ानी चाहिये ॥२॥
टिप्पणी: २–द्यावापृथिवी। अ० २।१।४। हे आकाशभूमी ! तदन्तरालवर्तिन्यो दिशो विवक्षिताः। उपश्रुत्या। उप+श्रु–क्तिन्, उपश्रूयते। समीपश्रवणेन पूर्णश्रवणशक्तिप्रदानेन। अन्यद् गतम् ॥
