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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य धर्म के पालन में निर्भय रहे।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (च) निश्चय करके (भूतम्) अतीत काल (च) और (भव्यम्) भविष्यत् [होनेहारा] काल (न) न (रिष्यतः) दुःख देते और (न) न (बिभीतः) डरते हैं, (एव) वैसे ही (मे) मेरे (प्राण) प्राण ! तू (मा बिभेः) मत डर ॥६॥
भावार्थभाषाः - समर्थ, सत्य प्रतिज्ञावाले मनुष्य पहले विजयी हुए हैं और आगे होंगे। इसी प्रकार सब मनुष्य भूत और भविष्यत् का विचार करके जो कार्य करते हैं, वे सुखी रहते हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६–भूतम्। भू–क्त। अतीतम्। गतकालः। भव्यम्। भव्यगेयप्रवचनीयो०। पा० ३।४।६८। इति भू–यत्। भविष्यत्। अनागतम् ॥
