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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य धर्म के पालन में निर्भय रहे।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (च) निश्चय करके (सत्यम्) यथार्थ (च) और (अनृतम्) अयथार्थ (न) न (रिष्यतः) दुःख देते और (न) न (बिभीतः) डरते हैं, (एव) वैसे ही (मे) मेरे (प्राण) प्राण ! तू (मा बिभेः) मत डर ॥५॥
भावार्थभाषाः - सत्य अर्थात् धर्म का विधान और असत्य अर्थात् अधर्म का निषेध, ये दो प्रधान अङ्ग न्याय के हैं। मनुष्य विधि और निषेध के यथावत् रूप को समझकर, कुमार्ग छोड़कर सुमार्ग में निर्भय चलें और अचल आनन्द भोगें ॥५॥ यजुर्वेद में वर्णन है–अ० १९ म० ७७। दृ॒ष्ट्वा रू॒पे व्याक॑रोत् सत्यानृ॒ते प्र॒जाप॑तिः। अश्रद्धा॒मनृ॒तेऽद॑धाच्छ्र॒द्धा स॒त्ये प्र॒जापतिः ॥१॥ (प्रजापतिः) प्रजाओं के रक्षक परमेश्वर ने (रूपे) दो रूप, (सत्यानृते) सत्य और झूँठ (दृष्ट्वा) देखकर (व्याकरोत्) समझाये। (प्रजापतिः) उस प्रजापति ने (अनृते) झूँठ में (अश्रद्धाम्) अश्रद्धा वा अप्रीति और (सत्ये) सत्य में (श्रद्धाम्) श्रद्धा वा प्रीति को (अदधात्) धारण कराया ॥
टिप्पणी: ५–सत्यम्। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति सत्–यत्। सद्भ्यो हितम्। तथ्यम्। यथार्थकथनम्। अनृतम्। न ऋतं नञ्समासः। मिथ्याभाषणम् ॥
