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यथा॒ सूर्य॑श्च च॒न्द्रश्च॒ न बि॑भी॒तो न रिष्य॑तः। ए॒वा मे॑ प्राण॒ मा बि॑भेः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा । सूर्य: । च । चन्द्र: । च । न । बिभीत: । न । रिष्यत: । एव । मे । प्राण । मा । बिभे: ॥१५.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:2» सूक्त:15» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मनुष्य धर्म के पालन में निर्भय रहे।

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (च) निश्चय करके (सूर्यः) सूर्य (च) और (चन्द्रः) चन्द्र, दोनों (न) न (रिष्यतः) दुःख देते हैं और (न) न (बिभीतः) डरते हैं, (एव) वैसे ही (मे) मेरे (प्राण) प्राण ! तू (मा बिभेः) मत डर ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे ईश्वर के नियम से सूर्य अपनी राशियों में घूमकर संसार में किरणों और प्रकाश द्वारा वृष्टि आदि से और चन्द्रमा सूर्य से प्रकाश लेकर अन्न आदि औषधों को पुष्ट करके, उपकार करते और निर्भय विचरते हैं, ऐसे ही मनुष्य भी वेदविहित धर्म की रक्षा करके सदा प्रसन्न रहें ॥३॥
टिप्पणी: ३–सूर्यः। अ० १।३।५। आदित्यः। सप्ताश्वः। चन्द्रः। अ० १।३।४। चन्द्रमाः ॥