पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य धर्म के पालन में निर्भय रहे।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (च) निश्चय करके (अहः) दिन (च) और (रात्री) रात दोनों (न) न (रिष्यतः) दुःख देते हैं और (न) न (बिभीतः) डरते हैं, (एव) वैसे ही (मे) मेरे (प्राण) प्राण ! तू (मा बिभेः) मत डर ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अपने कालप्रयोग में नहीं चूकते, वे अपने सुप्रबन्ध से सदा निर्भय रहते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २–अहः। नञि जहातेः। उ० १।१५८। इति नञ्+ओहाक् त्यागे–कनिन्। न जहाति न त्यजति सर्वथा परिवर्त्तमानत्वात् तद् अहः। दिनम्। रात्री। अ० २।८।२। रात्रिः कस्मात् प्ररमयति भूतानि नक्तञ्चारीण्युपरमयतीतराणि ध्रुवीकरोति रातेर्वा स्याद् दानकर्मणः प्रदीयन्तेऽस्यामवश्यायाः, निरु० २।१८। क्षपा। निशा ॥
