ब्रह्मचारी के समावर्त्तन, विद्यासमाप्ति पर वस्त्र आदि के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे ब्रह्मचारिन् !] (इदम्) इस (वासः) वस्त्र को (स्वस्तये) आनन्द बढ़ाने के लिये (परि+अधिथाः) तूने धारण किया है और (गृष्टीनाम्) ग्रहणीया गौओं की (अभिशस्तिपाः) हिंसा से रक्षा करनेवाला (उ) अवश्य (अभूः) तू हुआ है। (च) निश्चय करके (पुरूचीः) बहुत पदार्थों से व्याप्त (शतम्) सौ (शरदः) शरद् ऋतुओं तक (जीव) तू जीवित रह, (च) और (रायः) धन की (पोषम्) पुष्टि [वृद्धि] को (उप–सं–व्ययस्व) अपने सब ओर धारण कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग ब्रह्मचारी को विदित कर दें कि यह उसकी विद्या का सन्मान इसलिये किया गया है कि संसार में गौ आदि उपकारी पदार्थों और विद्या धन और सुवर्ण आदि धन की वृद्धि करके कीर्त्तियुक्त जीवन व्यतीत करे ॥३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से अथर्ववेद १९।२४।६। में है ॥