ब्रह्मचारी के समावर्त्तन, विद्यासमाप्ति पर वस्त्र आदि के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे विद्वानो !] (नः) हमारे लिये (इमम्) इस [ब्रह्मचारी] को (परि+धत्त) वस्त्र पहराओ और (वर्चसा) तेज वा अन्न से (धत्त) पुष्ट करो, [तथा इसका] (दीर्घम्) बड़ा (आयुः) आयु, वा आय, अर्थात् धनप्राप्ति और (जरामृत्युम्=जरा–अमृत्युं जरा–मृत्युं वा) स्तुति से अमरपन, अथवा, स्तुति वा बुढ़ापे से मृत्यु (कृणुत) करो। (बृहस्पतिः) बड़े-बड़े [विद्वानों] के रक्षक [राजा वा प्रधानाचार्य] ने (एतत्) यह (वासः) वस्त्र (सोमाय) सूर्यसमान (राज्ञे) ऐश्वर्यवाले [ब्रह्मचारी] को (उ) ही (परिधातवै) धारण करने के लिये (प्र+अयच्छत्) दान किया है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जब ब्रह्मचारी विद्या समाप्त कर चुके, विद्वान् पुरुष परस्पर उपकार के लिये उसकी योग्यता का सत्कार करें और राजा वा आचार्य विशेष वस्त्र आदि से अलंकृत करके उसका मान बढ़ावें, जिससे विद्या का प्रचार और आपस में प्रीति अधिक होवे ॥२॥ २–जैसे विद्वान् पुरुष विद्यादि चिह्नों से अलंकृत होकर पुरुषों में दर्शनीय होता है, वैसे ही मनुष्य, मनुष्य शरीर का चोला पाकर सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ गिना जाता है ॥