ब्रह्मचारी के समावर्त्तन, विद्यासमाप्ति पर वस्त्र आदि के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे तेजस्विन् परमेश्वर ! तू (आयुर्दाः) जीवनदाता और (जरसम्) स्तुतियोग्य कर्म को (वृणानः) स्वीकार करनेवाला, (घृतप्रतीकः) प्रकाशस्वरूप और (घृतपृष्ठः) प्रकाश [वा सार तत्त्व] से सींचनेवाला है। (अग्ने) हे तेजस्विन् ईश्वर ! [अग्नि के समान] (मधु) मधुर, (चारु) निर्मल, (गव्यम्) गौ के (घृतम्) घृत को (पीत्वा) पीकर, (पिता इव) पिता के समान (पुत्रान्) पुत्रों को (इमम्) इस [ब्रह्मचारी] की (अभि) सब ओर से (रक्षतात्) रक्षा कर ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे अग्नि गौ के घृत, काष्ठ आदि हवनसामग्री से प्रज्वलित होकर, हवन, अन्नसंस्कार, शिल्पप्रयोग आदि में उपयोगी होता है, वैसे ही परमेश्वर वेदविद्या के और बुद्धि, अन्न आदि पदार्थों के दान से मनुष्यों पर उपकार करता है, इसी प्रकार मनुष्यों को परस्पर उपकारी होना चाहिये ॥१॥