0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (तम् प्रति) उस [दुराचारी पुरुष] की ओर (अभिचर) चढ़ाई कर, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) वैर करता है और (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रीति करते हैं। (श्रेयांसम्) अधिक गुणी [परमेश्वर वा मनुष्य] को (आप्नुहि) तू प्राप्त कर, (समम्) तुल्यबलवाले [मनुष्य] से (अति=अतीत्य) बढ़कर (क्राम) पद आगे बढ़ा ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो छली कपटी धर्मात्माओं से अप्रीति करें और जिन दुष्कर्मियों से धर्मात्मा लोग घृणा करते हों, राजा उन दुष्टों को वश में करके दण्ड देवे ॥ २–सब मनुष्य शारीरिक और मानसिक रोगों को हटाकर सत्य धर्म में प्रवृत्त हों और प्रयत्नपूर्वक सदैव उन्नति करें ॥३॥
टिप्पणी: ३–प्रति। अभिलक्ष्य। अभि+चर। अभिभव। नाशय। यः। दुराचारी पुरुषः। अस्मान्। धर्मचारिणः। द्वेष्टि। द्विष अप्रीतौ–अदादित्वात् शपो लुक्। अप्रीत्वा गृह्णाति। जिघांसति। द्विष्मः। अप्रीत्या गृह्णीमः। अन्यद् गतम् ॥
