पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - तू (स्रक्त्यः) गतिशील (असि) है, (प्रतिसरः) प्रत्यक्ष चलनेवाला (असि) है और (प्रत्यभिचरणः) अभिचार [दुष्ट कर्म] का हटानेवाला (असि) है। (श्रेयांसम्) अधिक गुणी [परमेश्वर वा मनुष्य] को (आप्नुहि) तू प्राप्त कर, (समम्) तुल्यबलवाले [मनुष्य] से (अति=अतीत्य) बढ़कर (क्राम) पद आगे बढ़ा ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुषार्थी मनुष्य निष्कपट, सरल स्वभाव होकर अग्रगामी होता है, वह संकटों को हटाकर आनन्द प्राप्त करता है, मन्त्र १ देखिये ॥२॥
टिप्पणी: २–स्रक्त्यः। स्रक, स्रकि गतौसरकना–क्तिन्। स्रक्तिर्गतिः। भवे छन्दसि। पा० ४।४।११०। इति यत्। गतिमान्। उद्यमी। प्रतिसरः। प्रति+सृ गतौ–अच्। चितः। ६।१।१६३। अन्तोदात्तः। प्रति प्रत्यक्षं सरतीति। अग्रगामी। प्रत्यभिचरणः। प्रति+अभि+चर गमने, अदने, आचारे च–ल्युट्। प्रति प्रतिकूलम् अभिचरणम् अभिचारो हिंसनं यस्मात् स प्रत्यभिचरणः। व्यभिचारनिवारकः। अन्यद् व्याख्यातम् ॥
