ब्रह्म के मिलने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वही [ईश्वर] (नः) हमारा (पिता) पालक और (जनिता) जनक, (उत) और (सः) वही (बन्धुः) बान्धव है, वह (विश्वा=विश्वानि) सब (धामानि) पदों [अवस्थाओं] और (भुवनानि) लोकों को (वेद) जानता है। (यः) जो [परमेश्वर] (एकः) अकेला (एव) ही (देवानाम्) दिव्य गुणवाले पदार्थों का (नामधः) नाम रखनेवाला है, (संप्रश्नम्) यथाविधि पूँछने योग्य (तम्) उसको (सर्वा=सर्वाणि) सब (भुवना=०–नानि) प्राणी (यन्ति) प्राप्त होते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर संसार का माता, पिता, बन्धु और सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी है, वही पिता के समान सृष्टि के पदार्थों का नामकरण संस्कार करता है, जैसे, सूर्य, पृथिवी, मनुष्य, गौ, घोड़ा आदि। विद्वान् लोग सत्सङ्ग करके उस जगदीश्वर को पाते और आनन्द भोगते हैं ॥३॥ (नामधः) के स्थान पर सायणभाष्य, ऋग्वेद और यजुर्वेद में [नामधाः] है। २–यह मन्त्र ऋग्वेद १०।८२।३। तथा य० १७।२७। में कुछ भेद से है ॥