ब्रह्म के मिलने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (विद्वान्) विद्वान् (गन्धर्वः) विद्या का धारण करनेवाला पुरुष (अमृतस्य) अविनाशी ब्रह्म के (तत्) उस (परमम्) सबसे ऊँचे (धाम) पद का (प्रवोचद्) उपदेश करे (यत्) जो पद (गुहा=गुहायाम्) गुफा [प्रत्येक अगम्य पदार्थ हृदय आदि] के भीतर है। (अस्य) इस [ब्रह्म] की (गुहा) गुफा [अगम्यशक्ति] में (त्रीणि) तीनों (पदानि) पद (निहिता=०–तानि) ठहरे हुए हैं, (यः) जो [विद्वान् पुरुष] (तानि) उनको (वेद) जान लेता है, (सः) वह (पितुः) पिता का (पिता) पिता (असत्) हो जाता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् महात्मा पुरुष उस परब्रह्म की महिमा का सदा उपदेश करते रहते हैं। वह ब्रह्म सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् से महान् है। उसके ही वश में तीन पद, अर्थात् संसार की सृष्टि, स्थिति और नाश ये तीनों अवस्थाएँ, अथवा भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान, तीनों काल, अथवा सत्त्व, रज और तम, तीनों गुण वर्त्तमान हैं। जिस महापुरुष योगी को इन अवस्थाओं का विज्ञान व्यष्टि और समष्टिरूप से होता है, वह पिता का पिता अर्थात् महाविज्ञानियों में महाविज्ञानी होता है ॥२॥ १–यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है–अ० ३२। म० ९। २–मनु महाराज ने कहा है–अ० २।१५३। अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः। अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥१॥ अज्ञानी ही बालक होता है, वेदोपदेष्टा पिता होता है। [मुनि लोग] अज्ञानी को ही बालक और वेदोपदेष्टा को ही पिता कहते हैं ॥१॥