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नक्ष॑त्रमु॒ल्काभिह॑तं॒ शम॑स्तु नः॒ शं नो॑ऽभिचा॒राः शमु॑ सन्तु कृ॒त्याः। शं नो॒ निखा॑ता व॒ल्गाः शमु॒ल्का दे॑शोपस॒र्गाः शमु॑ नो भवन्तु ॥

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पद पाठ

नक्षत्रम्। उल्का। अभिऽहतम्। शम्। अस्तु। नः। शम्। नः। अभिऽचाराः। शम्। ऊँ इति। सन्तु। कृत्याः। शम्। नः। निऽखाताः। वल्गाः। शम्। उल्काः। देशोपऽसर्गाः। शम्। ऊँ इति। नः। भवन्तु ॥९.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:9


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मनुष्यों को कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (उल्का) उल्काओं [टूटते तारों] से (अभिहतम्) नष्ट किया हुआ (नक्षत्रम्) नक्षत्र (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक (अस्तु) होवे, (नः) हमारे लिये (अभिचाराः) विरुद्ध आचरण (शम्) शान्तिदायक (उ) और (कृत्याः) हिंसा क्रियाएँ (शम्) शान्तिदायक (सन्तु) होवें। (निखाताः) खोदे हुए (वल्गाः) गढ़े [सुरङ्ग आदि] (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक, (उल्काः) उल्काएँ [टूटते तारे] (शम्) शान्तिदायक, (उ) और (देशोपसर्गाः) देश के उपद्रव (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक (भवन्तु) होवें ॥९॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् पुरुष दैवी और मानुषी विपत्तियों से बचने का प्रयत्न करते रहें ॥९॥
टिप्पणी: ९−(नक्षत्रम्) गमनशीलो लोकः (उल्का) म० ८। उल्काभिः। रेखाकारे गगनात् पतत्तेजोभिः (अभिहतम्) विनष्टम् (शम्) शान्तिप्रदम् (अस्तु) (नः) अस्मभ्यम् (अभिचाराः) व्यभिचाराः। विरुद्धाचरणानि (शम्) (उ) चार्थे (कृत्याः) अ० १४।२।४९। कृञ् हिंसायाम्−क्यप् तुक् च। हिंसाक्रियाः (शम्) (नः) (निखाताः) विदारिताः (वल्गाः) मुदिग्रोर्गग्गौ। उ० १।१२८। वल संवरणे−ग प्रत्ययः। गर्ताः। भूमिच्छिद्राणि (शम्) (उल्काः) म० ८। गगनात्पतत्तेजःपुञ्जाः (देशोपसर्गाः) देशोपद्रवाः (शम्) (उ) (नः) (भवन्तु) ॥