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ब्रा॑ह्म॒णोऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा॑ज॒न्योऽभवत्। मध्यं॒ तद॑स्य॒ यद्वैश्यः॑ प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत ॥
पद पाठ
ब्राह्मणः। अस्य। मुखम्। आसीत्। बाहू इति। राजन्यः। अभवत्। मध्यम्। तत्। अस्य। यत्। वैश्यः। पत्ऽभ्याम्। शूद्रः। अजायत ॥६.६॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:6
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टिविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ब्राह्मणः) ब्राह्मण [वेद और ईश्वर का जाननेवाला मनुष्य] (अस्य) इस [पुरुष] का (मुखम्) मुख (आसीत्) था, (राजन्यः) क्षत्रिय [शासक मनुष्य] (बाहू) [उसकी] दोनों भुजाएँ (अभवत्) हुआ। (अस्य) इसका (यत्) जो (मध्यम्) मध्य [घुटनों का भाग] है, (तत्) वह (वैश्यः) वैश्य [मनुष्यों का हितकारी] और (पद्भ्याम्) [उसके] दोनों पैरों से (शूद्राः) शूद्र [शोचनीय मूर्ख] (अजायत) उत्पन्न हुआ ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य के शरीर में अङ्ग के समान परमात्मा की सृष्टि में ब्रह्मचर्य आदि शम दम व्रत से वेद और ईश्वर का जाननेवाला मनुष्य ब्राह्मण मुख के समान मुख्य सर्वहितकारी, वेदवेत्ता अधिक बल पराक्रमवाला क्षत्रिय भुजाओं के समान रक्षक, वेदज्ञ कृषि व्यापार आदि से धनी होकर मनुष्यों का हित करनेवाला पोषक वैश्य शरीर के मध्यभाग घुटनों के तुल्य, और मूर्ख विद्याहीन चल-फिर कर सेवा करनेवाला शूद्र मनुष्य पैरों के समान उपयोगी है ॥६॥
टिप्पणी: यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।९०।१२, यजुर्वेद−३१।११ ॥ ६−(ब्राह्मणः) वेदेश्वरवित् (अस्य) पुरुषस्य (मुखम्) मुखमिवोत्तमः (आसीत्) अभवत् (बाहू) भुजाविव बलवीर्ययुक्तः (राजन्यः) क्षत्रियः शासकः (अभवत्) (मध्यम्) मध्याङ्गम्। ऊर्वोरुपलक्षणमेतत् (तत्) मध्यम् (अस्य) पुरुषस्य (यत्) मध्यम् (वैश्यः) विशो मनुष्यनाम-निघ० २।३। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। विश−यञ्। विड्भ्यो मनुष्येभ्यो हितः। वेदाध्ययनकृषिवाणिज्यादिवृत्तिकः (पद्भ्याम्) पद्भ्यां गमनागमनव्यवहाराभ्यां सेवाशीलः (शूद्रः) शुचेर्दश्च। उ० २।१९। शुच शोके−रक्। दश्चान्तादेशो घातोर्दीर्घश्च। शोचनीयो विद्याहीनो मूर्खो जनः (अजायत) उत्पन्नोऽभवत् ॥
