आकू॑तिं दे॒वीं सु॒भगां॑ पु॒रो द॑धे चि॒त्तस्य॑ मा॒ता सु॒हवा॑ नो अस्तु। यामा॒शामेमि॒ केव॑ली॒ सा मे॑ अस्तु वि॒देय॑मेनां॒ मन॑सि॒ प्रवि॑ष्टाम् ॥
पद पाठ
आऽकूतिम्। देवीम्। सुऽभगाम्। पुरः। दधे। चित्तस्य। माता।सुऽहवा। नः। अस्तु। याम्। आऽशाम्। एमि। केवली। सा। मे। अस्तु। विदेयम्। एनाम्। मनसि। प्रऽविष्टाम् ॥४.२॥
अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:2
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
बुद्धि बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवीम्) दिव्य गुणवाली, (सुभगाम्) बड़े ऐश्वर्यवाली, (आकूतिम्) संकल्प शक्ति को (पुरः) आगे (दधे) धरता हूँ, (चित्तस्य) चित्त [ज्ञान] की (माता) माता [जननी उत्पन्न करनेवाली] वह (नः) हमारे लिये (सुहवा) सहज में बुलाने योग्य (अस्तु) होवे। (याम्) जिस (आशाम्) आशा [कामना] को (एमि) मैं प्राप्त करूँ, (सा) वह [आशा] (मे) मेरे लिये (केवली) सेवनीय (अस्तु) होवे, (मनसि) मन में (प्रविष्टाम्) प्रवेश की हुई (एनाम्) इस [आशा] को (विदेयम्) मैं पाऊँ ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य दृढ़ संकल्पी होकर ज्ञान को बढ़ावे, जिससे वह जिस शुभ कर्म की आशा मन में करे, वह पूरी होवे ॥२॥
टिप्पणी: २−(आकूतिम्) अ० ३।२।३। आङ्+कूञ् शब्दे−क्तिन्। संकल्पशक्तिम् (देवीम्) दिव्यगुणवतीम् (सुभगाम्) बह्वैश्वर्ययुक्ताम् (पुरः) अग्रे (दधे) धारयामि (चित्तस्य) मनोविचारस्य। ज्ञानस्य (माता) निर्मात्री जननी (सुहवा) सुष्ठुं दातव्या (नः) अस्मभ्यम् (अस्तु) भवतु (याम्) (आशाम्) आ समन्तादश्नुते-अच्। दीर्घाकाङ्क्षाम्। कामनाम् (एमि) प्राप्नोमि (केवली) अ० ३।२५।४। केवृ सेवने-कलच्, ङीप्। सेवनीया। असाधारणी (सा) आशा (मे) मह्यम् (अस्तु) (विदेयम्) विद्लृ लाभे−लिङि छान्दसं रूपम्। विन्देयम्। प्राप्नुयाम् (एनाम्) आशाम् (मनसि) हृदये (प्रविष्टाम्) निहिताम् ॥
