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ए॑कादश॒र्चेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

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पद पाठ

एकादशऽऋचेभ्यः। स्वाहा ॥२३.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एकाशर्चेभ्यः) ग्यारह [प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय दस प्राण और ग्यारहवें जीवात्मा] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥८॥
टिप्पणी: ८−(एकादशर्चेभ्यः) म०१॥ प्राणापानोदानव्यानसमाननागकृर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जया इति दश प्राणा एकादशो जीवात्मा, एतेषां स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः ॥