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न॑व॒र्चेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

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पद पाठ

नवऽऋचेभ्यः। स्वाहा ॥२३.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (नवर्चेभ्यः) नव [दो कान, दो आँख, दो नथने, एक मुख, एक पायु, एक उपस्थ, नवद्वारपुर शरीर] की स्तुतियोग्य विद्यावाले [वेदों] के लिये [स्वाहा] स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को परमेश्वरोक्त ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद द्वारा श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त करके इस जन्म और पर जन्म का सुख भोगना चाहिये ॥६॥
टिप्पणी: ६−(नवर्चेभ्यः) म०१। नवद्वारपुरस्य शरीरस्य स्तुत्या विद्या येषु वेदेषु तेभ्यः। द्वे श्रोत्रे चक्षुषी नासिके च मुखमेकं द्वे पायूपस्थे-इति शरीरस्य नवछिद्ररूपाणि द्वाराणि ॥